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ज़हूर की अलामतें

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़हूर की अलामतों को दो हिस्सों में तक़सीम किया जा सकता है

(1)     हतमी अलामतें

(2)     शर्ति अलामातें

हतमी अलामतें

हतमी अलामाते वह हैं जो हज़रते महदी अलैहिस्सलाम के ज़हूर से पहले ज़रूर वाक़े होंगी और उनमें किसी क़िस्म का बदलाव नही होगा ।

शर्ति अलामतें

यह वह अलामतें हैं जो बन्दों के आमाल से मुताल्लिक़ हैं। अगर ख़ुदा चाहेगा तो वाक़े होंगी वरना आबिदों की इबादत और नेक लोगों की तौबा व इस्तेग़फ़ार की वजह से टाल दी जायेगी। यह भी मुम्किन है कि उनकी मुद्दत में तूल दे दिया जाये, लेकिन मेरे नज़दीक इसका इम्कान कम है। क्योंकि संसार की हालत रोज़ बरोज़ बद से बदतर होती जा रही है। इंसानी अख़लाक़ की गिरावट इन्तेहा तक पहुँच चुकी है। ज़माना तेज़ी से बुराई की तरफ़ बढ़ रहा है, जिसकी वजह से अलामतें भी जल्द जल्द मुकम्मल हो रही है। इस लिए यक़ीन है कि शर्ति अलामतें  भी ज़रूर मुकम्मल होंगी और जल्द ही होंगी। क्योंकि ज़माने को बहर हाल बुराईयों से पुर होना है इस लिए उनको हतमी अलामते ही समझ लेना चाहिए। अब उन तमाम हालात की तफ़सील तो मुझे नही लिखनी है, क्योंकि मैं यह सब क़ियामते सुग़रा में तहरीर कर चुका हूँ। अलबत्ता इस दौरान मुझ से यह मुतालेबा बार बार किया जाता रहा है कि अब सिर्फ़ वह अलामतें तहरीर करें जो अब तक मुकम्मल नही हुई हैं, ताकि उनका इन्तेज़ार किया जाये और उनकी जानिब ज़्यादा तवज्जोह दी जाये। लिहाज़ा मैं इस किताब में ज़्यादा तर वही अलामतें तहरीर करुँगा जो अब तक मुकम्मल नही हुई हैं।

सब से पहले हतमी अलामतों का ज़िक्र करना मुनासिब होगा। यह तमाम अलामतें ज़हूरे हज़रते महदी अलैहिस्सलाम से बिल्कुल नज़दीक व मुत्तसिल वाक़े होंगी। किताब कमालुद्दीन में जनाब शैख़ सदूक़ की सनद से नक़्ल किया गया है कि इब्ने ऊमैर बिन हनज़ला ने कहा कि मैं ने इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से सुना कि आप फ़रमाते थे कि ज़हूरे हज़रते क़ाइम से पहले 5 अलामतें हतमी हैं, यानी वह ज़रूर वाक़े होंगी।

(1)     ख़ुरुजे यमानी

(2)     ख़ुरुजे सुफ़यानी

(3)     सैह़ा ए- आसमानी ( आसमानी चीख़)

(4)     क़त्ले नफ़्से ज़किय्यः

(5)     सहरा ए- बैदा में सुफ़यानी के लशकर का धंस जाना

(बिहारुल अनवार जिल्द 13 )

इन के अलावा दूसरे मक़ाम पर आप ही ने यह भी इरशाद फ़रमाया है कि आसमान में एक हाथ का नमूदार होना भी हतमी आलामतों में से है और अबू हमज़ा की रिवायत में मशहूर है कि सूरज का मग़रिब से निकलना भी हतमी है।

सुफ़यानी कौन है ?

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने इरशाद फ़रमाया कि ख़ुरुजे सुफ़यानी, यमानी, ख़ुरासानी एक साल एक माह और एक ही रोज़ वाक़े होगा। बस उनके दरमियान परचमों, झन्डों का फ़र्क़ होगा। यानी यमानी का झन्डा हिदायत का झन्डा होगा, क्योंकि वह लोगों को हज़रत साहिबुल अम्र अलैहिस्सलाम की जानिब दावत देगा। पस जब वह ज़ाहिर हो जाये तो मुसलमानों  पर जंग के असलह बेचना हराम है, क्योंकि अब मुसलमानों  को ख़ुद असलहे की ज़रूरत होगी। किसी भी मुसलमान  के लिए हलाल नही कि वह इस झन्डे की मुख़ालेफ़त करे, अगर करेगा तो वह दोज़ख़ी होगा।

सुफ़यानी कौन है ?

किताब ग़ैबते शैख़े तूसी में बशीर बिन ग़ालिब ने रिवायत की है कि सुफ़यानी रुम के शहरों से आयेगा जो ईसाई होगा और ईसाईयत की अलामत सलीब गले में डाले होगा और वह अपनी क़ौम का रईस होगा । (बिहारुल अनवार  13 )

तफ़्सीरे अयाशी में लिखा है कि उसका मक़सद शियायाने आले मुहम्मद को क़त्ल करने और सूली पर लटकाने के अलावा और कुछ न होगा (बिहारुल अनवार  13 )

किताबे इरशादे शैख़े मुफ़ीद में इस ज़माने की एक अहम अलामत बयान की गयी है और वह यह है कि सूरज सुबह से दोपहर तक इस के ज़माने में एक मक़ाम पर साकिन होगा जिसमें किसी शख़्स का चेहरा व सीना नज़र आयेगा। सुफ़यानी की हलाकत के क़रीब ऐसा होगा इससे पहले पाँच शहरों पर उसका क़ब्ज़ा होगा दमिशक़, हम्स, फ़िलिस्तीन, उरदुन, क़िनसिरीन उसकी मुद्दते सलतनत सिर्फ़ आठ माह होगी।

सैहा ए आसमानी

हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अबू हमज़ा ए समाली से बयान फ़रमाया कि अव्वल रोज़ एक मुनादी निदा करेगा और आख़िर रोज़ शैतान निदा करेगा जिससे अहले बातिल शक में मुब्तेला हो जाऐंगे। आप ही ने इरशाद फ़रमाया कि माहे रमज़ान की तेईसवीं शब शबे जुमा में जिब्राईल की आवाज़ आयेगी जो सोते हुए अफ़राद को बेदार कर देगी। यह आवाज़ हज़रत क़ाइम से मुताल्लिक़ होगी और आख़िर रोज़ शैतान की आवाज़ होगी। कुछ रिवायतों में है कि अव्वले शब व आख़िरे शब आवाज़ आयेगी। मुम्किन है कि मुख़्तलिफ़ मक़ामात के वक़्त के फ़र्क़ की वजह से ऐसा हो। क्योंकि कुछ जगह दिन होगा और कुछ जगह रात। पूरी दुनिया का कोई इंसान ऐसा न होगा जो उस आवाज़ को न सुनेगा, मगर अकसर लोग दूसरी आवाज़ से शक में मुब्तिला हो जायेंगे।

मक्का मोअज़्ज़मा में नफ़्से ज़किय्या का क़त्ल

ज़हूर की यह अलामत भी हतमी है। किताब ग़ैबते शैख़े तूसी में सुफ़यान इबने ईब्राहीम हरीरी अपने पिदर के हवाले से नक़ल करता है कि नफ़्से ज़किय्यः आले मुहम्मद के जवानों में से एक जवान होंगे। यानी सादात में से होंगे और उनका नाम मुहम्मद बिन हसन होगा। वह बग़ैर जुर्म के रुक्न व मक़ाम के दरमियान क़त्ल किये जाऐंगे। उनके क़त्ल में और क़ायमे आले मुहम्मद के ज़हूर में 15 रातों से ज़्यादा का फ़ासला नही होगा।

( बिहारुल अनवार  13)

सुफ़यानी के लशकर का ज़मीन में धंसना

किताब तफ़सीरे अयाशी में जाबिर जोफ़ी के हवाले से तहरीर है कि ईमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने इरशाद फ़रमाया कि जो अलामतें मैं तुमसे बयान कर रहा हूँ, जब उनको देखना तो अपनी जगह से हरकत न करना। सबसे पहली अलामत तो यह है कि दमिश्क़ में एक मुनादी की निदा बलन्द होगी और उसके बाद वहाँ का एक देहात ज़मीन में धंस जायेगा और मस्जिदे दमिश्क़ का एक हिस्सा बर्बाद हो जायेगा। उस वक़्त तुर्कों का एक गिरोह (शायद रुसी) दमिश्क से गुज़र कर जज़ीरे में उतर आयेगा और रुमी (अंग्रेज़) रमल्ला में दाख़िल हो जायेंगे। ऐसा उस साल होगा जब तमाम सर ज़मीने अरब में इख़्तेलाफ़ ही इख़्तेलाफ़ वाक़े होगा और शाम में तीन परचम इख़्तेलाफ़ का सबब बनेंगे। परचमे असहब (ज़र्द व सुर्ख़) परचमुल बुक़ा (सियाह व सफ़ेद) और परचमे सुफ़यानी। सुफ़यानी और उसके साथियों के साथ शदीद तरीन जंग वाक़े होगी। सुफ़यानी का मक़सद शीयायाने आले मुहम्मद को नाबूद करने के अलावा कुछ न होगा। इस लिए वह एक लशकर कूफ़े रवाना करेगा और वहाँ शीयायाने आले मुहम्मद को क़त्ल करेगा और बहुत सों को सूली देगा। उस वक़्त ख़ुरासान (ईरान) से एक लशकर आयेगा जो दजला के किनारे आकर रुकेगा, मगर सुफ़यानी से शिकस्त खा जायेगा ।

पस उसके बाद सुफ़यानी दूसरा लशकर मदीने को रवाना करेगा जो वहाँ के तमाम सादात को क़ैद करेगा। उसके बाद महदी ए- आले मुहम्मद की तलाश शुरु हो जायेगी, मगर आप मदीने से मक्के तशरीफ़ ले आयेंगे। यह लशकर आप का पीछा करता हुआ जब वादी ए बैदा में (जो मक्के के करीब है) पहुँचेगा तो ज़मीन में धंस जायेगा। ख़बर पहुँचाने वाले के अलावा कोई दूसरा आदमी बाक़ी न रहेगा। उस वक़्त हज़रत क़ाइम अलैहिस्सलाम रुक्न व मक़ाम के दरमियान मशग़ूले नमाज़ होंगे। इसके बाद आप ख़ुत्बा इरशाद फ़रमायेंगे और लोगों को अपनी नुसरत के लिए बुलायेंगे। फ़ौरन तीन सौ तेरह अफ़राद जिन में पचास औरतें होंगी बादल के टुकड़ों की तरह एक के बाद एक जमा हो जायेंगे। उनके जमा होने के बाद आसमान से सदा ए खुरुज बलन्द होगी (सैहा ए आसमानी) फिर तक़रीबन दस हज़ार अफ़राद आप के पास जमा हो जायेंगे। उस वक़्त सुफ़यानी का लशकर बयाबाने रमल्ला में होगा और उस लशकर की बड़ी तादाद हज़रत क़ाइम से मिल जायेगी। उसके बाद जंग होगी जिसके नतीजे में सुफयानी अपने एक साथी के साथ क़त्ल कर दिया जायेगा। हज़रत क़ायमे आले मुहम्मद अलैहिस्सलाम के लशकर के हाथ कसीर तादाद में माले ग़नीमत आयेगा ।   

बिहारुल अनवार  की 13 वीं जिल्द में अल्लामा मजलिसी ने आइम्मा ए ताहेरीन के हवाले से नक़्ल किया है कि एलाने ज़हूर तो रमज़ान में होगा, मगर क़यामे हज़रत हुज्जत रोज़े आशूरा ताक़ साल में होगा। यानी आप उस वक़्त ख़ुरुज फ़रमायेंगे  और सबसे पहले आपकी बैअत करने वाले जिब्राईल होंगे।

शर्तियः  अलामतें

1) किताब मुसतदरकुल वसाइल में है कि हुज़ूरे अकरम (स.) ने इरशाद फ़रमाया कि सयाती ज़मानुन अला उम्मती यफ़िर्रुना मिनल उलमा कमा यफ़िर्रुल ग़नम मिनज़ ज़ेब इबतला हुम अल्लाहु बे सलासते अशयाईन

1)  यरफउल बरकता मिन अमवालेहिम

2)  सल्लता अल्लाहु अलैहिम सुल्तानन जायेरन

3)  यख़रुजूना मिनद्दुनिया बिला ईमानिन

यानी मेरी उम्मत पर एक ज़माना ऐसा आयेगा जब लोग उलमा से इस तरह दूर भागेंगे जैसे बकरियां भेड़िये से दूर भागती हैं। उस वक़्त ख़ुदा उनको तीन चीजों में मुबतला करेगा।

   पहली यह कि उनके माल से बरकत उठ जायेगी।

दूसरे यह कि ज़ालिम हाकिम व सुल्तान उन पर मुसल्लत हो जायेंगे ।

तीसरे यह कि वह दुनिया से बे ईमान उठेंगे।

नोटः यहाँ उलमा से मुराद उलमा ए रुहानी हैं, जिन से अलहदगी से दीन हाथ से निकल जायेगा। अभी तक पूरी तरह उलमा से दूरी अख़तियार नही की गई है इस लिए अलामत बाक़ी है। मुमकिन है बाद में उलमा से बिलकुल बेज़ारी अख़तियार की जाये।

2) हज़रत हुज्जत अलैहिस्सलाम ने शेख़ मुफ़ीद को जो ख़त तहरीर फ़रमाया कि उसमें फ़रमाया है कि जब उस मख़सूस साल का माहे जमादियुल अव्वल आ जाये तो इबरत अख़तियार करना उन वाक़ेआत से जो उस महीने में और उसके बाद रुनुमा होंगे। तब बहुत जल्द आसमान से तुम्हारे लिए एक अलामत आशकार होगी और फ़ौरन ही ज़मीने मशरिक़ में वह चीज़ वाक़े होगी जो हुज़्न पैदा करने वाली और दिलों में इज़्तेराब का मूजिब होगी। उसके बाद ईराक़ पर वह गिरोह ग़ालिब आ जायेगा जो इस्लाम से ख़ारिज होगा और उनकी बद आमालियों की वजह से अहले इराक़ मईशत की तंगी में मुबतला हो जायेंगे। मगर जब उनमें से एक शरीर इंसान मर जायेगा तो परहेज़गार लोग बहुत ख़ुश हो जायेंगे। दुनिया से आने वालों के लिए हज के रास्ते खुल जायेंगे

नोटः यह अलामत क़ाबिले ग़ौर है मुम्किन है इससे मुराद बअस पार्टी हो या बाद में ऐसी कोई हुकूमत आये जिसका इस्लाम से कोई वास्ता न हो, मसलन रुस वग़ैरह वल्लाह आलम। बहर हाल अभी आसमान व ज़मीन की अलामत भी बाक़ी हैं।

3) किताब ग़ैबते नोमानी में अबू बसीर के हवाले से तहरीर है कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि क़ाइम के ख़ुरुज के वक़्त दो ताऊन का ज़ाहिर होना लाज़मी है। एक सफ़ेद ताऊन और दूसरा सुर्ख़ ताऊन । सफ़ेद ताऊन यानी मर्गे सरीअ मर्गी मफ़ाजात और सुर्ख़ ताऊन यानी जंग व ख़ूनरेज़ी।

नोटः मर्गे मफ़ाजात में रोज़ाना इज़ाफ़ा होता जा रहा है और अभी तीसरी जंगे अज़ीम वाक़े नही हुई है। इनतेज़ार ज़रुरी है लिहाज़ा यह अलामत भी पूरी नही हुई है

4) किताब ग़ैबते शैख़ तूसी में अबदुर्रहमान इब्ने कसीर ने ब्यान किया कि मेरे सामने इमाम जाफ़र सादिक़ का ख़िदमत में महज़म नाम का एक शख़्स आया और उसने ज़हूर के वक़्त के बारे में दरियाफ़्त किया, तो इमाम ने फ़रमाया जो शख़्स ज़हूर का वक़्त मुऐय्यन करता है वह झूट बोलता है और जो ज़हूर के लिए जल्दी करता है, यानी कहता है कि क्यों नही आये और क्यों नही आते हैं। वह हलाकत की तरफ़ जा रहे हैं और जो अम्रे इलाही को तसलीम कर के इन्तेज़ार कर रहे हैं, वही निजात पाने वाले हैं और उनकी बाज़गश्त हमारी तरफ़ होगी ।

(बिहारुल अनवार 3)

5) किताब ग़ैबते शैख़ तूसी में जाबिर जोफ़ी ने हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम और किताब ग़ैबते नोमानी में अबू बसीर ने इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के हवाले से ब्यान किया कि दोनो इमामों ने फ़रमाया कि क़ाइम का ज़हूर उस वक़्त तक न होगा जब तक कि तमाम इंसान छलनी में छान न लिए जाऐं, यानी अच्छे और बुरे अलहदा न हो जाऐं। जैसे गेहूं छान कर घास से अलग कर दिये जाते हैं, उसी तरह शिया मसाइब व इम्तेहान की छलनी में छाने जाऐंगे मगर यह उस वक़्त होगा जब 2/3 मुसलमान आबादी दीन से बाहर हो जायेगी।

अबू बसीर कहते हैं कि हम ने इमाम से कहा कि जब 2/3 मुसलिम आबादी ख़त्म हो जायेगी तो फ़िर बाक़ी क्या रह जायेगा ? इमाम ने फ़रमाया "क्या तुम इस बात से ख़ुश नही हो कि तुम बाक़ी 1/3 में शामिल रहो! (यह अलामत भी बाक़ी है) अलबत्ता शियों के इम्तेहान का सिलसिला शुरु हो चुका है और दीन को तर्क करने वाले मुसलमानों की तादाद भी रोज़ाना बढ़ रही है।

6) हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि आख़िरी ज़माने में शियों की तादाद इस क़द्र कम हो जायेगी जैसे आँखों से सुर्मा धीरे धीरे कम हो जाता है और यह भी पता नही चल पाता कि पूरी तरह कब ख़त्म हो गया। लिहाज़ा वह वक़्त आयेगा जब लोग सुबह को  हमारी शरीअत पर होंगे और रात को उस शरीअत से ख़ारिज हो चुके होंगे और कुछ रात में ईमानदार होंगे लेकिन सुबह को बेदीन। (बिहारुल अनवार 13)

 यह अलामत भी अभी मुकम्मल नही हुई है अलबत्ता सिलसिला जारी हो चुका है कि दीन की मुख़ालेफ़त में महाफ़िल व मजालिस मुनअक़िद होती है जिनको तमद्दुन का नाम दिया जाता है। उन मजालिस में तमाम तक़लीद यहूद व नसारा की की जाती है जो मुख़ालिफ़े इस्लाम हैं। मालूम नही इस इबतेदा की इनतेहा क्या होगी और दीन किस तेज़ी से मुसलमानों से दूर हो जायेगा और हम किन बलाओं में गिरफ़्तार होंगे। अलबत्ता जो हज़रात दीन पर बाक़ी रहेंगे उनका मर्तबा बेहद बलन्द होगा हुज़ूरे अकरम ने उन्हे अपने भाई क़रार दिया है और फ़रमाया है कि वह तारीक रात में नूरानी चिराग़ का मानिन्द हैं जिन के नूरे ईमान से लोग फ़ायदः उठा सकेंगे और ख़ुदा उनको हर फ़ितने से निजात अता फ़रमायेगा।  

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इरशाद फ़रमाया उस दौर में हिफ़ाज़ते दीन के लिए दुआ ए ग़रीक़ पढ़ने वाला निजात पा जायेगा। मुहम्मद बिन सनान कहता है कि मैंने इमाम से पूछा कि दुआ ए ग़रीक़ क्या है ? तो आप ने फ़रमाया

"या अल्लाहु या रहमानु या रहीमु या मुक़ल्लेबल कुलूब सब्बित क़ल्बी अला दीनिक"         

7) उस ज़माने में शियों का फ़रीज़ा

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि उस ज़माने में शियों का फ़र्ज़ यह है कि अपने घरों का फ़र्श बन जायें, फ़ित्ना फ़साद में शिरकत न करें ताकि यह फ़ित्ना उन्ही को नुक़्सान पहुँचाये जो उसके पैदा करने वाले हैं। अगर ऐसा किया तो ख़ुदा वन्दे आलम शियों को आज़ार पहुँचाने वालों को ऐसे कामों में मशग़ूल कर देगा कि उनकी फ़िक्र शियों की जानिब से हट जायेगी । (यह अलामत क़ाबिले तवज्जोह है )

दूसरे मक़ाम पर इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने जाबिर से फ़रमाया कि ज़माना ए ग़ैबत में हमारे शियों के लिए बेहतरीन काम अपनी ज़बान की हिफ़ाज़त करना और अपने घरों में रहना है (बिहार 13)

 मक़सद यह है कि शियों को बुरे कामों और फ़ितनों से दूर रहना चाहिए ताकि ज़बान और हाथों से बद कारों की मदद न हो सके।

किताब किफ़ायतुल असर में हज़रत अमीरुल मोमनीन अलैहिस्सलाम से नक़्ल किया गया है कि आप शहरे कूफ़ा में मिम्बर से आख़िरी ज़माने की अलामतें ब्यान फ़रमाते हुए फ़रमाया कि तुम लोगों को चाहिए कि उस वक़्त अपने घरों में रहो और इबादते ख़ुदा करते रहो और ऐसे बन जाओ जैसे कोई आदमी अंगारे को हाथ में पकड़ ले और जलने पर सब्र करे ज़िक्रे ख़ुदा तमाम चीज़ो से बरतर है । ( बिहार 13 )

8 इल्मे दीन का पोशीदा हो जाना

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इरशाद फ़रमाया कि लोगों पर ऐसा वक़्त आयेगा कि जब इल्मे दीन इस तरह पोशीदा हो जायेगा जैसे सांप अपने बिल में पोशीदा हो जाता है। मक़सद यह है कि ख़ौफ़ व तर्स की वजह से मुम्किन न होगा कि कोई शख़्स इल्मे दीन व अहकामें दीन ब्यान करने की जुरअत कर सके, ख़ुसूसन मक्का व मदीना के दरमियान। इस लिए लोगों का फ़रीज़ा है कि अपनी साबेक़ा मालूमात पर साबित क़दम रहें यहाँ तक कि ख़ुदा हज़रत बक़िय्यतुल्लाह को भेज दे । (यह अलामत भी पूरी नही हुई है क्योंकि अभी तो इल्मे दीन का फरोग़ है )

इसी अलामत के ज़ैल में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इरशाद फ़रमाया कि यह उस वक़्त होगा जब शियों के दरमियान शदीद इख़तेलाफ़ात पैदा हो जायेंगे। एक दूसरे को झूटा कहेगा और एक दूसरे के मुँह पर थूकेगा, तब वक़्ते ज़हूर बहुत नज़दीक होगा। (बिहार 13)

9 पैग़म्बरे अकरम (स,अ) की ब्यान करदा चन्द मुशतरेका रिवायतें

जिन में फ़रमाया कि क़ाइम का ज़हूर जब होगा जब मर्द औरतों की शबीह और औरतें मर्दों की शबीह बन जायेंगी। जब मर्द मर्दों और औरते औरतों पर इक्तेफ़ा करेंगी, उससे पहले औरत की औरत से शादी हो चुकी होगी। फ़िस्क़ व फ़ुजूर और गुनाहों पर लोग हंसेंगे और फ़ख्र करेंगे, ऐसा करने वालों को कोई बुरा न कहेगा, नशा आवर चीज़े सरे आम पीने का रिवाज होगा हाजियों के न जाने की वजह से बैतुल लाह मोअत्तल हो जायेगा।

उस ज़माने में औरते अपनी अन्जुमनें (कलब) बनायेंगी, औरतों की तरह नौ जवान अपने बालों के रंग तब्दील करके उनमें कंघी करके इस तरह सजायेंगे जैसे बीवी ख़ुद को शौहर के लिए सजाती है। नौ जवानों को रक़म दे कर अपने साथ इग़लाम(गुदा मैथुन) करायेंगे । इग़लाम की तरफ़ लोगों की रग़बत बढ़ जायेगी बल्कि उस अमल पर एक दूसरे से हसद किया जायेगा । लोग अपने महरमों के साथ मसलन बेटी और बहन से ज़िना करेंगे और शादी न करेंगे बल्कि उन पर इक्तेफ़ा किया जायेगा। मर्दों को औरतों के साथ शादी करने पर सर ज़निश की जायेगी और उनको लवात(समलैंगिक्ता) का शौक़ दिलाया जायेगा। मुसलमान औरतें अपने आप को काफ़िरों के सपुर्द करेंगी, (उनके साथ अय्याशी में मसरुफ़ रहेंगी) गाने बजाने के आलात का इस क़द्र रिवाज बढ़ जायेगा कि कोई शख़्स दूसरे को मना करने की जुर्अत न कर सकेगा। (क्योंकि ख़ुद मुलव्विस होगा )

अहले बैते पैग़म्बर को गालियाँ दी जायेंगी और आइम्मा से मुहब्बत करने वालों की गवाही क़ाबिले क़ुबूल न होगी। औरते मिम्बरे रसूल पर चढ़ेंगी और ना महरमों तक उनकी आवाज़ पहुँचने की वजह से मलाएका उन पर लानत करेंगे। मुर्दों को क़ब्र से निकाल कर अज़िय्यत दी जायेगी, उन का कफ़न फ़रोख़्त किया जायेगा। इन्सान हैवान से मुक़ारेबत ( संभोग) करेगा,    (मर्द जानवरों से और औरतें रीछ और कुत्तों से) लोगों की ज़िन्दगी माले हराम, रिशवत, सूद, और जुए के ज़रिए ख़ुश हाल होगी। औरतें मिस्ल हैवानात मनज़रे आम पर शहवत रानी में मशग़ूल होंगी और ख़ौफ़ की वजह से कोई उनको बुरा भी न कह सकेगा। औलाद माँ बाप के मरने पर ख़ुश होगी। जिस दिन लोग गुनाहे कबीरा न करेंगे उस दिन ग़मगीन होंगे ।

नोटः तफ़्सीली ख़ुत्बात हैरत अंगेज़ हैं जिन में आज कल के मुआशरे की चौदह सौ बरस पहले मुकम्मल तौर से अक्कासी की गई है। यहाँ मैंने कुछ अलामतें दर्ज की हैं। तफ़्सीलात क़ियामते सुग़रा हिस्सा अव्वल में मुलाहेज़ा फ़रमाये। इस वक़्त मैं निम्न लिखित अलामतों की तरफ़ ख़ास तवज्जोह दिलाना चाहेता हूं, क्योंकि इनमें से अक्सर अभी तक पूरी नही हुई हैं। पैग़म्बरे अकरम (स.अ) और आइम्मा अलैहिस्सलाम के यह ख़ुतबात, दर अस्ल उन हज़रात के मोजज़े और इनके मुस्तक़बिल के इल्म के शाहकार हैं। मेरा इस्तेदलाल यही है कि जब इन हज़रात की बयान करदा 91% अलामतें पूरी हो चुकी हैं, तो अब 10% में शक नही किया जा सकता। मगर फ़ितरते इन्सानी यह है कि अपनी अक़्ल के बल बूते पर मुख़्तलिफ़ तावीलें करते हुए ख़ुद को शक में मुबतेला करता रहेगा। यहाँ तक कि आने वाला वक़्त आ जायेगा और उस वक़्त वक्त अफ़सोस करने के अलावा कोई चारा न रहेगा।

तशरीही इशारे

1)  जब मर्द औरतों की और औरतें मर्दों की शबीह बन जायेंगी

चूँकि यह अलामतें ज़मीन के किसी एक हिस्से से मख़सूस नही हैं, बलिक पूरी ज़मीन से मोतअल्लिक़ है, इस लिए यह अलामतें तो तकरीबन दुनिया के तमाम हिस्सों में मुकम्मल हो चुकी हैं। कहीँ कम कहीँ ज़्यादा। अलबत्ता यूरोप और अमेरिका में कसरत से ऐसे लड़के नज़र आते हैं जो बनाओ सिंघार और ज़ेवरात के पहनने में औरतों से बिल्कुल मुशाबेह हैं। लिबास में लड़कियां बिल्कुल लड़कों के मुशाबेह हो चुकी हैं और ऐसे लड़कों और लड़कियों को पंख कहा जाता है। क्योंकि उन दोनों के बाल भी हुज़ूरे अकरम के इरशाद के मुताबिक़ मिस्ले कोहाने शुतुर हो चुके हैं। अब धीरे धीरे हमारे मुल्कों में भी मेक अप और बालों की सजावट तक़रीबन एक जैसी हो रही है। लिबास में शेबाहत तो बहुत पुरानी बात है। अलबत्ता बदलते हुए फ़ैशन के तक़ाजों के पेशे नज़र बहुत ज़ल्द लड़कियों में बाल कटवा कर खुले कालर की क़मीस पहनने का रिवाज हो जायेगा और फ़िर दोनों में मुशाबेहत बढ़ जायेगी, बल्कि दोनों की पहिचान मुशकिल हो जायेगी और तब यह अलामत पूरी होगी और शर्म व हया रखने वाले माँ बाप के पास अपनी औलाद को इस हालत में देख कर सब्र करने के सिवा कोई चारा रह जायेगा। इस अलामत की तकमील धीरे धीरे हो रही है। रोज़ाना फ़ैशन बदल रहा है ।

2)  औरत की औरत से शादी

 जब मैंने क़ियामते सुग़रा के तीसरे एडीशन में इस अलामत को तहरीर किया, तो मुझ पर एक प्रोफ़ेसर साहब की जानिब से फ़ोन के ज़रिए एतेराज़ हुआ कि हम आपके छठे इमाम के पूरे ख़ुतबे से जो क़ियामते सुग़रा में दर्ज किया गया है, बहुत मोतअस्सिर हुए लेकिन हम यह समझने से क़ासिर हैं कि यह अलामत कैसे मुकम्मल होगी? इस लिए कि आपस में ना जायज़ ताल्लुक़ात का जहाँ तक सवाल है, तो वह बहुत क़दीम है मगर तज़व्वजन निसा बिन निसा में ज़ौजियत का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है जो क़ानूनी रिशते और तअल्लुक़ पर दलालत करता है। और ऐसा पूरी दुनिया में कहीँ नही है लिहाज़ा आप इस की तशरीह करके हमें मुतमईन करें या इस इबारत को काट दें। मैंने जवाब के लिए थोड़ा सा वक़्त लिया ताकि मालूमात में इज़ाफ़ा कर सकूँ। ख़ुदा गवाह है कि अभी कुछ ही दिन गुज़रे थे कि पाकिस्तान के अख़बारों में यह बात छपी कि दो मुलकों ने क़ानूनन दो औरतों को इजाज़त दे दी है कि वह आपस में शौहर व बीवी की हैसियत से रह सकते हैं। अब तो यह इजाज़त बहुत से मुल्कों में आम है। मैं खुद अपनी आँखों से कैली फ़ोर्निया में एसे जोड़े देख कर आया हूँ। इस लिए ज़माना ए मुस्तक़बिल में दूसरे मुलकों पर भी शक नही किया जा सकता। (ख़ुदा मुसलमानों को महफ़ूज़ रखे )

3)   इक्तफ़र रिजालु बिर रिजालि वन निसाउ बिन निसाए

 जब मर्द मर्द के लिए काफ़ी होगा और औरत, औरत के लिए। यानी शादियाँ करने का रिवाज ख़त्म होना शुरु हो जायेगा। बल्कि इस से जान बूझ कर बचा जायेगा (अल अमान अल हफ़ीज़) यह अलामत इस क़द्र सख़्त व इबरत नाक है कि मुकम्मल तशरीह भी नही की जा सकती। मगर समझने के लिए कुछ इशारे और आँखों देखी लिख रहा हूँ। मुम्किन है कि अमरिका और यूरोप की तरह दूसरे मुल्कों में भी बहुत जल्दी ही माली मुश्किलात और ज़ाती फ़ुज़ूल ख़र्ची की बिना पर नौजवान मर्द लड़कियों से बिल्कुल दूर रहना शुरु कर देगें। क्योंकि इस वक़्त भी यह हालत तो हो चुकी है कि नौजवान मर्द क़ानूनी तौर शादी करना पसन्द नही करता क्योँकि इससे क़ानूनी ज़िम्मे दारियोँ में इज़ाफ़ा और पाबन्दियों में ज़्यादती हो जाती है। लिहाज़ा दोनो ब्वाए फ्रेंड और गर्ल फ़्रेंड की शक्ल में साथ रहना पसन्द करते हैं। इस दरमियान अगर कोई औलाद हो जाती है तो चूँकि वह जायज़ नही होती इस लिए इसकी मालिक हुकुमत बन जाती है और उस औलाद की क़ानूनन वह ज़िम्मेदारियाँ नही समझी जाती जो अस्ल की होती है। अब अगर पाँच दस साल के आपसी तजरुबे की बिना पर दोनों शौहर बीवी की शक्ल में रहना पसन्द करें तो चर्च में जा कर क़ानूनन व मज़हबन शादी कर लेते हैं वरना अलग हो कर फिर दोनो अपना अपना रास्ता तलाश कर लेते हैं और ज़िम्मेदारियोँ से सुबुक दोश रहते हैं। मगर औलाद का पैदा होना एक मस्अला फिर भी बाक़ी रहता है जो अक्सर परेशानी का सबब बनता है। मुम्किन है कि आने वाले ज़माने में हुकुमतें ऐसी औलाद के लिए कुछ सख़्त क़ानून बना दें। इस लिए इससे बचने का सिर्फ़ एक रास्ता यही रह जाता है कि आपसी ताल्लुक़ात में ऐसे ज़राए का इस्तेमाल किया जाये जिन से औलाद के पैदा होने का ख़तरा ही टल जाये। यह शौक़ और वबा इस क़द्र आम हो चुकी है कि इस की तफ़सील लिखना ला हासिल है। मगर उन ज़राए के इस्तेमाल से दोनों की सेहत पर जो असरात मुरत्तब हो रहे हैं वह बड़े भयानक हैं और मुख़तलिफ़ बीमारियों के फैलने का सबब बन रहे हैं। इस वजह से खुद बखुद उन मुल्कों की पैदाईश की दर में कमी शुरु हो गई है जिससे तनासुबे (अनुपात) आबादी पर असर पड़ रहा है। मुम्किन है आहिस्ता आहिस्ता यह रफ़्तार इबरत अंगेज़ तौर पर घट जाये, मगर फिल हाल इस मस्अले से निमटने का यही तरीक़ा इख़्तियार किया है कि औलाद के पैदा होने के ख़ौफ़ से मुतमईन हो जायें, ताकि किसी किस्म की कोई ज़िम्मेदारी बाक़ी न रहे और तसकीने जज़्बात व शहवत रानी में कोई रुकावट न हो, तो इसका एक रास्ता यही है कि मर्द मर्दों से काम चलायें  और औरतें औरतों से। इसी वजह से यह वबा तेज़ी से दुनिया में आम हो रही है। आप ख़ुद इस बारे में मुझ से ज़्यादा मालूमात रखते हैं। मेरे लिए इस से ज़्यादा तफ़सील लिखने में हया माने है। अल बत्ता मैंने यूरोप और अमरिका के सफ़र में इस अलामत के बारे में काफ़ी मालूमात हासिल की हैं और नतीजे से लरज़ रहा हूँ। मेरी रूह इस तसव्वुर से घबराती है कि अगर खुदा न ख़्वासता हमारी ज़िन्दगी ही में जंगे अज़ीम हो गई और कसरत से मर्द क़त्ल हो गए तो औरतों का तनासुबे आबादी क्या हो जायेगा और उन का क्या हश्र होगा। जब कि हुज़ुरे अकरम ने सिर्फ़ मिस्र वालों के मुताल्लिक़ फ़रमाया है कि वहाँ तनासुबे आबादी पचास औरतों में एक मर्द का बाक़ी रहेगा। इसके अलावा आज कल पूरी दुनिया में औरतों की शरहे विलादत इस क़द्र ज़्यादा है कि पढ़ी लिखी, हसीन व जमील लड़कियों का अच्छा रिशता मिलना दुशवार हो रहा है, तो फिर आने वाले ज़माने में क्या हाल होगा और मर्दों के बराबर हुक़ूक़ माँगने वाली औरतों का क्या अन्जाम बनेगा। यह तरीक़ा अपनाने से क्या मौजूदा दौर की इन्सानियत का अन्जाम भी क़ौमे लूत जैसा न होगा। (अल अयाज़ो बिल्लाह )

4)  हज का रास्ता बंद हो जायेगा

 यह अलामत अभी पूरी नही हुई है क्योँ कि अभी पूरी दुनिया से सऊदी अरब पहुँचने के ज़राए मौजूद हैं और मुसलमान आसानी के साथ हज की सआदत हासिल करते हैं, लेकिन बाद में ऐसा वक़्त आयेगा। मुम्किन है जंग की वजह से ऐसा हो कि कोई हज के लिए आसानी से न जा सके बल्कि हज का रास्ता ही बंद हो जाये।

5)  अज़ान व नमाज़ पढ़ाने की उजरत ली जायेगी

 यह अलामत अगरचे पूरी हो चुकी है लेकिन अभी पेश नमाज़ साहेबान नमाज़ की उजरत कह कर नही लेते, बल्कि नक़्ल व हरकत का मुआवेज़ा लेते हैं। मुम्किन है इसके बाद बराहे रास्त नमाज़ व अज़ान का मुआवेज़ा लिया जाये ।

6)  किताब कमालुद दीन में शैख़ सदूक़ और किताब ग़ैबते नोमानी में हज़रत इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम के हवाले से तहरीर है कि ज़हूर से पहले दो अलामतें ज़रूर ज़ाहिर होंगी (1) महीने की पाँचवी तारीख़ को चाँद ग्रहन और पंद्रहवीं तारीख़ को सूरज ग्रहन जब कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की पैदाइश से लेकर अब तक ऐसा न हुआ होगा। उस वक़्त मुनज्जेमीन (सितारों की हरकत का इल्म रखने वाले लोग) का हिसाब नाकाम हो जायेगा (बिहार 13) यह अलामत भी अभी मुकम्मल नही हुई है। कुछ रिवायतों में है कि इमाम जाफ़र सादिक़ ने इरशाद फ़रमाया कि सूरज ग्रहन माहे रमज़ान की पाँच तारीख़ को होगा या पंद्रह तारीख़ को और चाँद ग्रहन माहीने के आख़िर में।

7)  सुर्ख़ मौत और सफ़ेद मौत

सुर्ख़ मौत ख़ून रेज़ी और सफ़ेद मौत ताऊन। नतीजे में इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि सात में से पाँच अफ़राद मर जायेंगे।  यानी 2/3 आबादी ख़त्म हो जायेगी (यह अलामत भी अभी बाक़ी है )

8)  बसरा की तबाही और आसमानी आग

किताब इरशादे शैख़े मुफ़ीद में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के हवाले से तहरीर किया है कि ज़हूर की ख़ास अलामतों में से आसमान में आग का फ़ैल जाना या आसमान से आग का ज़ाहिर होना और बग़दाद व बसरा की ज़मीन का धंस जाना। ख़ुसूसन बसरा में बेहद ख़ून रेज़ी होगी । मकानात बर्बाद हो जायेंगे और वहाँ के रहने वाले चारों तरफ़ बिखर जायेंगे । बल्कि कुल अहले ईराक़ पर ख़ौफ़ ग़ालिब आ जायेगा। (यह अलामत भी बाक़ी है।)

9)  नंगी औरतें

हज़रत अमीरुल मोमनीन ने असबग़ बिन नबाता से इरशाद फ़रमाया कि जब वक़्ते ज़हूर होगा तो वह सबसे बुरा ज़माना होगा। क्योंकि उस वक़्त ऐसी औरतें ज़ाहिर होंगी जिन का सर और चेहरा खुला होगा और लिबास पहनने के बाद भी जिस्म नंगा होगा। ज़ीनत व आराईश उन का शिआर होगा और वह दीने ख़ुदा से ख़ारिज हो जायेंगी। मर्दों के ऊमूर में शिरकत करेंगी, शहवत की जानिब राग़िब होंगी, लज़्ज़तों की तरफ़ तेज़ी से दौड़ेंगी और हरामे ख़ुदा को हलाल कर लेंगी। ऐसी औरतें हमेशा जहन्नम में रहेंगी।

हुज़ूरे अकरम (स.अ) ने इरशाद फ़रमाया कि ऐसी औरतों के सर के बाल कोहाने शुतुर की तरह मुख़्तसर हो जायेंगे (पंख) चूँकि वह लानत शुदा हैं, लिहाज़ा तुम भी ऐसी औरतों पर लानत करो। आज कल की औरतें ख़ुसूसन मुसलमान औरतें इन इरशादात की रौशनी में अपनी शक्ल मुलाहेज़ा कर लें, क्योंकि अभी भी थोड़ी सी पुरानी तहज़ीब बाक़ी है। कुछ औरतों के सरों पर अभी दुपट्टा भी है और जिस्म भी ढ़का हुआ है, रफ़्ता रफ़्ता यह अलामत मुकम्मल हो रही है। मुम्किन है कि बाद में आने वाली नस्ल से यह चीज़ें बिल्कुल ग़ायब हो जायें। अलामतों में चूँकि यह इरशाद फ़रमाया है कि यह औरतें दीन से ख़ारिज हो जायेंगी तो उस से मुराद यक़ीनन मुसलमान औरतें हैं वरना मुशरिक व काफ़िर औरतों का दीन से ताल्लुक़ ही क्या। मुसलमान औरतों के लिए यह अलामत दर्से इबरत है ।

10)   ख़ाइन व फ़ाजिर ओलमा

हुज़ूरे अकरम (स.अ) ने इरशाद फ़रमाया कि ऐ इब्ने मसऊद आख़िरे ज़माने के उलमा बद तरीन ख़ल्क़े ख़ुदा होंगे। ख़ुदा उनको ऐसी हालत में दोज़ख़ में दाख़िल करेगा कि वह अन्धे गूंगे और बहरे होंगे। ऐ इब्ने मसऊद वह उलमा दावा करेंगे कि वह मेरे दीन और मेरी सुन्नत पर अमल पैरा हैं। लेकिन हक़ीक़त में वह मुझ से बेज़ार हैं और मैं उनसे। ख़ुदा की क़सम जिसने मुझे रसूल बना कर भेजा कि वह उलमा बन्दर व सुअर की शक्ल में मस्ख़ कर दिये जायेंगे । यह उलमा वह होंगे जिन्होंने मफ़ाद व ज़ीनत और हुसूले दुनिया के लिए इल्मे दीन हासिल किया होगा। ख़ुदा ने जन्नत को उनके ऊपर हराम कर दिया है। उनके तमाम इल्म की बुनियाद रियाकारी पर होगी, क्योंकि वह ख़ुद उस इल्म पर अमल पैरा न होंगे। किताब रौज़तुल वाएज़ीन में तहरीर है कि हुज़ूरे अकरम (स.अ) ने इरशाद फ़रमाया कि आख़िरी ज़माने में उलमा ब कसरत के साथ इस तरह क़त्ल किये जायेंगे जैसे चोर और डाकू क़त्ल किये जाते हैं। काश उस ज़माने के उलमा ख़ुद को नादान क़रार देते ताकि बच जाते। दूसरे मक़ाम पर इरशाद फ़रमाया कि आख़िरे ज़माने के उलमा लोगों को आख़ेरत की तरफ़ दावत देंगे लेकिन ख़ुद दुनिया दार होंगे। यह उलमा जब्बार व मुतकब्बिर व दुशमने ख़ुदा होंगे। (बिहार)

और हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने इरशाद फ़रमाया कि उन उलमा का मैलान फ़लसफ़ा और तसव्वुफ़ की जानिब होगा। ख़ुदा की क़सम यह उलमा शरीअते इस्लाम के रास्ते को तर्क करके राहे हक़ में तहरीफ़ की कोशिश करेंगे और नये नये अक़ाइद से हमारे दोस्तों और शियों को गुमराह करेंगे। उन की ज़िन्दगी रियाकारी और तज़वीर से भरपूर होगी, ताकि लोगों की तवज्जोह का मरकज़ बन सकें। अपने दीन व ईमान की हिफ़ाज़त के लिए ऐसे उलमा से दूरी ज़रूरी है। यह उलमा पार्टियाँ बनायेंगे और उन के सहारे ज़िन्दगी बसर करेंगे। इसके बाद इरशाद फ़रमाया कि मेरे बाद मेरे मिम्बर पर औरतें चढ़ेंगी इस हालत में कि नजिस होंगी और बन्दर मशग़ूले रक़्स होंगे। यानी बच्चे और बे पढ़े लिखे लोग मिम्बर पर अजीब व ग़रीब हरकतें और तक़रीरें करेंगे। यह अलामत काफ़ी हद तक पूरी हो चुकी है और बाक़ी पूरी हो रही है

 (किताब ऐहतेरामे मिम्बर मुलाहेज़ा फ़रमायें)

11)   किताब ग़ैबते तूसी से मुख़्तलिफ़ अलामतें

फज़्ल बिन शाज़ान इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के हवाले से ब्यान करते हैं कि क़ाइम का ज़हूर उस वक़्त तक न होगा जब तक कि 12 बनी हाशिम अपने महदी होने का दावा न कर लें । ( अभी यह अलामत बाक़ी है)

हज़रत अमीरुल मोमनीन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि क़ब्ल अज़ ज़हूर ख़ास अलामत पहली मर्तबा टिड्डियों का आना अपने वक़्त पर और फिर सुर्ख व ख़ूनी रंग की टिड्डियों का आना ग़ैर वक़्त पर ज़रूरी है ।

हज़रत अम्मारे यासिर ने फ़रमाया कि ज़हूर का उस वक़्त इन्तेज़ार करना जब तुर्क (रूसी) और रूम (अंग्रेज़ ईसाई) आपस में जंग शुरू कर दें और रूए ज़मीन जंग की लपेट में आ जाये और दमिश्क के क़िले से आवाज़ बलन्द हो और दमिश्क की मस्जिद की  दीवार बर्बाद हो जाये तो समझो कि अब वक़्त क़रीब है। क्योंकि उस वक़्त दमिश्क फ़तह हो चुका होगा और शाम का एक देहात जिसका नाम जानिबिया होगा ज़मीन में धंस जायेंगा। (अभी यह अलामत बाक़ी है ) रूसी तुर्क, जज़ीरे में (यानी जज़ीरतुल अरब में) और रूमी (ईसाई) उस में दाख़िल हो जायेंगे। उस साल मग़रिब में शदीद इख़्तालाफ़ पैदा होंगे और सबसे पहले शाम का इलाक़ा बर्बाद होगा। 1) सुर्ख़ व सफ़ेद

2) सियाह व सफ़ेद

3) सुफ़यानी झंडा (अभी यह अलामत बाक़ी है )

सईद बिन जुबैर ने ब्यान किया है कि जिस साल इमाम महदी का ज़हूर होगा, उस साल चौबीस मर्तबा बारिश होगी। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने इरशाद फ़रमाया कि ज़हूर से पहले औफ़ बिन सलमा जज़ीरे से खुरूज करेगा। उसके बाद सुफ़यानी मलऊन का वादी ए याबिस से खुरूज होगा।

किताब अलाइमे ज़ोहूर  से कुछ अलामतें

वक़्ते ज़हूर की ख़ास अलामत हज़रत की शमशीर का ख़ुद ब ख़ुद ग़िलाफ़ से बाहर आ जाना है। दज्जाल का ख़ुरूज और दरया ए सावा में पानी का आ जाना, ज़हूर के साल में दरख़्तों के फलों का ख़राब होना, ऐसे टेलीफ़ोन का आम हो जाना जिस में दूर दराज से बात करने वाले की तस्वीर भी नज़र आये। शहरे क़ुम से इल्मे दीन का मुन्तशिर होना। ईरान के सिक्के का ईराक़ में रिवाज ख़त्म हो जाना। मिम्बरों पर जाहिलों और अतफ़ाल का ब सूरते ख़तीब नमूदार होना। हज़रत रसूले अकरम (स.अ) ने अहले मदीना से मुख़ातिब हो कर इरशाद फ़रमाया कि क़ियामत उस वक़्त तक वाक़े न होगी, जब तक तुम्हारा मुक़ाबला तुर्कों से न हो जाये। वह जमाअत जिन की आँखे छोटी, चेहरे सुर्ख़, दिमाग़ छोटे और चेहरे चौड़े और पुर गोशत हों। बुख़ारी में है कि उनके जूते बालों के होंगे। (चीनी) किताब महदी ए मुन्तज़र में हुज्जतुल इस्लाम आक़ा ए मुहम्मद जवाद ख़ुरासानी ने तहरीर फ़रमाया है कि ज़हूर से पहले निम्न लिखित अलामतों का पूरा होना ज़रूरी है (1) शिद्दते फ़ितना व फ़साद व जंग इस की इन्तेहा यह होगी कि पैग़म्बरे अकरम (स.अ) के मुताबिक़ ज़मीन पर किसी जगह कोई पनाह गाह बाक़ी न रहेगी।

 हज़रत मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के मुताबिक़ इन्सानों का हाल ख़ौफ ज़दह बकरियों का सा होगा, जो न अपना दिफ़ाअ कर सकती हों और न उन्हें पनाह मिल सकती हो और क़साई  हाथ में छुरी लिये उसके सर पर मौजूद हो। अक़्ल मन्दों की अक़ले इस फ़ित्ने से इस तरह ज़ायल हो जायेंगी जैसे अक़्ल मन्द इन्सान जानवर हो गये हों। दुनिया के हर गोशे में ऐसा फित्ना बरपा होगा जिससे लोग मरने की दुआ करने लगेंगे और क़ब्रों पर जाकर मुर्दों से कहेंगे काश मैं तेरी जगह होता, भाई भाई को क़त्ल  करेगा ।

कूफ़े में दारुल अमारा की फिर से तामीर

 कूफ़े के दरियाए फ़ुरात पर अज़ीम पुल की तामीर जहाँ 70000 अदमी क़त्ल होंगे और दरिया ए फ़ुरात का पानी रंगीन हो जायेगा। तीन झन्डे कूफ़े में जमा होंगे मगर क़ातिल व मक़तूल दोनों जहन्नमी होंगे।

हुकूमतें तेज़ी से मुन्क़लिब होंगी सुबह को कोई हाकिम होगा और शाम को कोई और हाकिम होगा ।

मुसलसल तीन साल तक शदीद क़हत पड़ेगा।

ज़लज़ले बहुत ज़्यादा आयेंगे, पूरी दुनिया में ख़ुसूसन शाम का ज़लज़ला जिस में एक लाख अदमी मारे जायेंगे ।

मशिरक़ में 12 मुशतबह झन्डे यके बाद दीगरे ज़ाहिर होंगे जिन में ताअय्युन न हो सकेगा कि कौन सा झन्डा हिदायत का है और कौन सा गुमराही का ।

बग़दाद में पत्थरों की बारिश होगी और सुर्ख़ हवा चलेगी जिस से चेहरे झुलस जायेंगे और वहाँ के उलमा की शक्ल सुअर और बन्दर जैसी हो जायेगी। चेहरों का रंग सियाह और आंखे नीली हो जायेंगी ।  

ज़हूर वाले साल में सर्दी बहुत ज़्यादा होगी।

किताब बिहारुल अनवार में अल्लामा मजलिसी ने तहरीर फ़रमाया है कि रसूले अकरम (स.अ) ने इरशाद फ़रमाया कि स-याती ज़मानुन तकूनो बलदत क़ुम्मिन व अहलिहा हुज्जतुन अलल ख़लाइक़े यानी बहुत जल्दी वह वक़्त आने वाला है कि शहरे क़ुम और वहाँ के रहने वाले लोग दुनिया पर हुज्जत होंगे और वहाँ के प्रोग्राम से इस्तेफ़ादह करेंगे और उस पर अमल पैरा होंगे। दुनिया का जो भी सितम्गर क़ुम की जानिब बुराई का क़स्द करेगा वह हलाक हो जायेगा।      

सफ़ीनतुल बिहार में हज़रत मूसा इब्ने जाफ़र अलैहिमा अस्सलाम से रिवायत है कि आपने फ़रमाया कि क़ुम से एक शख़्स खड़ा होगा, जो लोगों को हक़ की दावत देगा। लोगों के गिरोह लोहे के टुकड़े की तरह उस के गिर्द जमा हो जायेंगे जिनको ज़माने की तुन्द व तेज़ हवाएं भी अपने मक़ास से हटा न सकेंगी। वह लोग जंग व रज़्म से दिल तंग नही होंगे। उनमें हिरास व ख़ौफ़ क़तअन पैदा न होगा। उनका ज़ाते ख़ुदा पर तवक्कुल होगा और अन्जाम नेक तो परहेज़गारों से मुतअल्लिक़ है।

किताब अक़ाइदुल इमामिया इस्ना अशरियः में हज़रत अमीरुल मोमनीन अलैहिस्सलाम से मनक़ूल है कि आप ने फ़रमाया कि यहूदी पूरी दुनिया से सिमट कर फ़िलिस्तीन में आ जायेंगे  और अपने लिए एक हुकूमत क़रार देंगे। पहले जो लोग उनसे जंग करेंगे शिकस्त खाएंगे फिर मुसलमान अरबों से मुत्तहिद हो जायेंगे तो सब मिल कर जंग करेंगे और फतह मन्द होंगे और कोई यहूदी फिलिस्तीन में बाक़ी न रहेगा। (इनशाअल्लाह)